दैनिक सांध्य बन्धु जबलपुर। मध्य प्रदेश में ओबीसी को जनसंख्या के अनुपात में 51% आरक्षण देने की मांग पर जबलपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर नाराजगी जताई है। हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैथ और जस्टिस विवेक जैन की बेंच ने सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए अंतिम रूप से 2 हफ्ते का समय दिया है।
अगर इस अवधि में सरकार जवाब नहीं देती है, तो 15 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि इस मामले में अगली सुनवाई 16 जून को होगी।
सरकार का रवैया सवालों के घेरे में
'यूनियन फॉर डेमोक्रेसी एंड सोशल जस्टिस' की ओर से दायर याचिका में मध्य प्रदेश में ओबीसी की आबादी 51% होने का दावा किया गया है और इसी अनुपात में आरक्षण देने की मांग की गई है। यह याचिका 2024 में दायर की गई थी, लेकिन अब तक 11 सुनवाई हो चुकी हैं और सरकार ने कोई ठोस जवाब पेश नहीं किया है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर और विनायक प्रसाद शाह ने पक्ष रखते हुए कहा कि 2011 की जनगणना के अनुसार
एससी की आबादी - 15.6%
एसटी की आबादी - 21.14%
ओबीसी की आबादी - 50.9%
मुस्लिमों की आबादी - 3.7%
अन्य अनारक्षित वर्ग - 8.66%
लेकिन राज्य में आरक्षण का वर्तमान वितरण एससी - 16%, एसटी - 20% और ओबीसी - 14% तक सीमित है।
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के बावजूद कार्रवाई नहीं
याचिका में दलील दी गई कि इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को ओबीसी वर्ग की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति की नियमित समीक्षा के लिए स्थायी आयोग गठित करने का निर्देश दिया था।
हालांकि, मध्य प्रदेश में आयोग तो बना, लेकिन ओबीसी वर्ग के उत्थान के लिए कोई ठोस कार्य नहीं किया गया। राज्य सरकार ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि वह ओबीसी को बढ़ा हुआ आरक्षण देना चाहती है या नहीं।
अब सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार हाईकोर्ट के आदेश पर समय रहते जवाब दाखिल करेगी, या फिर उसे जुर्माने का सामना करना पड़ेगा? 16 जून की सुनवाई इस मामले में अहम साबित हो सकती है।